
से आस्था का केंद्र बना पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर, मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता से बढ़ी श्रद्धालुओं की आस्था
RK GLOBAL NEWS राजकुमार विशेष रिपोर्ट फरसाबहार/बोखी। जशपुर जिले के फरसाबहार विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत बोखी के मुड़ापारा में स्थित पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर पिछले करीब तीन दशकों से ग्रामीणों की आस्था, विश्वास और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 30 वर्ष पहले यहां एक वटवृक्ष का पौधा उगा था। समय के साथ यह वृक्ष विशाल रूप लेता गया और इसके आसपास पूजा-अर्चना की परंपरा विकसित होती गई।
1. तीन दशक पुरानी आस्था की कहानी
स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार मुड़ापारा में स्थित यह वटवृक्ष करीब 30 वर्ष पुराना है। ग्रामीण बताते हैं कि शुरुआती दौर में यहां केवल एक पौधा था, लेकिन धीरे-धीरे वृक्ष बड़ा होता गया और लोगों की धार्मिक आस्था इससे जुड़ती चली गई।
2. घनश्याम यादव ने रखी नींव
ग्रामीणों के अनुसार घनश्याम यादव ने इस धार्मिक स्थल की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से वटवृक्ष के आसपास पूजा-अर्चना का वातावरण तैयार हुआ और धीरे-धीरे ग्रामीण इस स्थान से जुड़ने लगे।
3. पंचमुखी वटवृक्ष बना आस्था का प्रतीक
समय के साथ यह वटवृक्ष स्थानीय लोगों के लिए सामान्य पेड़ न रहकर धार्मिक आस्था का प्रतीक बन गया। श्रद्धालु इसे पंचमुखी वटवृक्ष के रूप में पूजते हैं और यहां पहुंचकर अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।
से आस्था का केंद्र बना पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर, मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता से बढ़ी श्रद्धालुओं की आस्था

स्थानीय लोगों के अनुसार घूर्णन बाबा इस पंचमुखी वटवृक्ष की नियमित रूप से पूजा-अर्चना किया करते थे। उनके द्वारा की जाने वाली पूजा और धार्मिक गतिविधियों से इस स्थल की पहचान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी बनने लगी।
5. संतान प्राप्ति की मान्यता से जुड़ी कहानी
इस मंदिर से जुड़ी एक प्रमुख स्थानीय मान्यता गुरुजी बैजू और उनकी पत्नी से संबंधित बताई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार उनके घर संतान नहीं हो रही थी। उन्होंने पंचमुखी वटवृक्ष के समक्ष श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की और संतान प्राप्ति की कामना की।
6. मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता
स्थानीय श्रद्धालुओं का कहना है कि पूजा-अर्चना के बाद गुरुजी बैजू और उनकी पत्नी के घर बेटी का जन्म हुआ। इस घटना को ग्रामीण पंचमुखी वटवृक्ष की आस्था से जोड़कर देखते हैं। इसी मान्यता के बाद इस धार्मिक स्थल के प्रति लोगों का विश्वास और अधिक मजबूत हुआ।
7. श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था
मनोकामना पूर्ण होने की इस स्थानीय मान्यता के बाद आसपास के ग्रामीणों में पंचमुखी वटवृक्ष के प्रति श्रद्धा और बढ़ती गई। लोग यहां पूजा करने, मन्नत मांगने और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करने आने लगे।
8. आज भी जारी है पूजा-अर्चना
करीब 30 वर्ष बीत जाने के बाद भी यहां पूजा-अर्चना की परंपरा जारी है। ग्रामीण अपनी श्रद्धा के अनुसार पंचमुखी वटवृक्ष के समक्ष पूजा करते हैं और धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
9. ग्रामीणों की सहभागिता
इस धार्मिक स्थल की देखरेख और पूजा-अर्चना की परंपरा में स्थानीय लोगों की सहभागिता महत्वपूर्ण मानी जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि सामूहिक सहयोग से ही वर्षों से इस स्थान की धार्मिक पहचान कायम है।
10. सेवा से जुड़े प्रमुख श्रद्धालु
पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर से जुड़े लोगों में घूर्णन बाबा, मथुरा दास वैष्णव, फुलमनी बाई और सेवक कैलाश दास वैष्णव सहित अनेक श्रद्धालुओं का नाम स्थानीय लोग सम्मान के साथ लेते हैं।
11. गणमान्य नागरिकों का सहयोग
इसके अलावा धनसाय पैंकरा, तुलसी दास, रघु यादव, रविंदर, महिजोर के गणेश भगत और जयराम भगत सहित बोखी के अनेक गणमान्य नागरिक एवं ग्रामीण इस धार्मिक परंपरा में अपना सहयोग देते रहे हैं।
12. सामाजिक एकजुटता का केंद्र
पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर की विशेषता केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह स्थल ग्रामीणों को एक साथ जोड़ने का भी कार्य करता है। धार्मिक आयोजन और पूजा के अवसर पर लोग सामूहिक रूप से शामिल होते हैं।
13. पीढ़ियों से आगे बढ़ रही परंपरा
स्थानीय श्रद्धालुओं का कहना है कि इस स्थल से जुड़ी धार्मिक परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रही है। बुजुर्गों द्वारा बताई गई मान्यताओं और परंपराओं को नई पीढ़ी भी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रही है।
14. वटवृक्ष के संरक्षण की जरूरत
वटवृक्ष भारतीय संस्कृति और ग्रामीण धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व रखता है। ऐसे में स्थानीय लोगों का मानना है कि पंचमुखी वटवृक्ष का संरक्षण और आसपास के धार्मिक स्थल का व्यवस्थित विकास किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत से जुड़ी रह सकें।
15. आस्था के साथ प्रकृति का संदेश
यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देता है। वर्षों पुराने वटवृक्ष के संरक्षण से ग्रामीणों में पेड़-पौधों और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर मिलता है।
16. श्रद्धालुओं की मनोकामना और विश्वास
स्थानीय श्रद्धालु पंचमुखी वटवृक्ष के सामने श्रद्धा से सिर झुकाकर परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं। हालांकि मनोकामना पूर्ण होने से जुड़ी बातें स्थानीय आस्था और मान्यता पर आधारित हैं।
17. बोखी की धार्मिक पहचान
ग्राम पंचायत बोखी के मुड़ापारा में स्थित यह पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर अब स्थानीय स्तर पर धार्मिक पहचान बना चुका है। ग्रामीणों के लिए यह स्थान उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है।
18. श्रद्धा और विश्वास की मजबूत डोर
तीन दशक की यात्रा में इस स्थल ने ग्रामीणों की आस्था को अपने साथ जोड़े रखा है। समय बदलने के बावजूद पूजा-अर्चना की परंपरा में कमी नहीं आई। बल्कि स्थानीय मान्यताओं और श्रद्धालुओं के विश्वास के कारण यह स्थान लगातार लोगों के बीच चर्चा और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है।
19. ग्रामीणों की मांग—स्थल का संरक्षण हो
स्थानीय लोगों का मानना है कि पंचमुखी वटवृक्ष जैसे धार्मिक और प्राकृतिक महत्व वाले स्थलों का संरक्षण आवश्यक है। यदि यहां आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएं तो श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना में सुविधा मिलेगी और यह स्थान क्षेत्र की धार्मिक पहचान के रूप में और बेहतर तरीके से विकसित हो सकता है।
20. आस्था, परंपरा और एकजुटता का प्रतीक
पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर की करीब 30 वर्षों की कहानी केवल एक पेड़ के बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि यह आस्था, विश्वास, धार्मिक परंपरा, प्रकृति संरक्षण और ग्रामीण एकजुटता की कहानी है। घनश्याम यादव द्वारा नींव रखे जाने से लेकर घूर्णन बाबा और अन्य श्रद्धालुओं की पूजा-अर्चना तथा आज की पीढ़ी की सहभागिता तक यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है।

निष्कर्ष
ग्राम पंचायत बोखी के मुड़ापारा में स्थित पंचमुखी वटवृक्ष मंदिर आज भी ग्रामीणों के लिए श्रद्धा का पवित्र स्थल बना हुआ है। मनोकामना पूर्ण होने से जुड़ी स्थानीय मान्यता ने इस स्थान की आस्था को और मजबूत किया है। घूर्णन बाबा, मथुरा दास वैष्णव, फुलमनी बाई, सेवक कैलाश दास वैष्णव, धनसाय पैंकरा, तुलसी दास, रघु यादव, रविंदर, महिजोर के गणेश भगत, जयराम भगत सहित अनेक ग्रामीणों की सहभागिता इस परंपरा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों का विश्वास है कि पंचमुखी वटवृक्ष केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि उनकी आस्था, संस्कृति और सामूहिक विश्वास की जीवंत पहचान है।













