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सिर्फ संदेह के आधार पर गिरफ्तारी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, अवैध हिरासत पर राज्य को देना होगा मुआवजा”


हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना संज्ञेय अपराध के गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत असंवैधानिक, पीड़ित को ₹25,000 मुआवजे का आदेश

RK GLOBAL NEWS राजकुमार की विशेष रिपोर्ट बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 21 की रक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने अशरफ बेग बनाम राज्य शासन मामले में स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजना कानून के विपरीत है। न्यायालय ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को ₹25,000 का मुआवजा 30 दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया।

प्रमुख बिंदु

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता अशरफ बेग की याचिका स्वीकार की।

मामला कथित रूप से पुलिस द्वारा बिना संज्ञेय अपराध दर्ज किए गिरफ्तारी से जुड़ा था।

पुलिस ने शांति भंग की आशंका का हवाला देते हुए कार्रवाई की।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ने समझौते का दबाव बनाया और इंकार करने पर गिरफ्तार किया।

कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने जमानत मंजूर की, लेकिन सत्यापन के नाम पर जेल भेज दिया गया।

जमानत बांड देने के बावजूद कई दिनों तक रिहाई नहीं हुई।

न्यायालय ने माना कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

पुलिस को गिरफ्तारी से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।

यदि संज्ञेय अपराध का आधार नहीं है, तो व्यक्ति को अनावश्यक रूप से जेल नहीं भेजा जा सकता।

मजिस्ट्रेट का दायित्व है कि वह हिरासत की आवश्यकता का स्वतंत्र परीक्षण करे।

  1. अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में Arnesh Kumar, D.K. Basu, Nilabati Behera, Sube Singh, Hardeep Singh, Shreya Singhal तथा Mehmood Nayyar Azam जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि अनावश्यक गिरफ्तारी और अवैध हिरासत नागरिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।

अंतिम आदेश

खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। इसलिए राज्य सरकार 30 दिनों के भीतर ₹25,000 का मुआवजा अदा करेगी। इसके साथ ही याचिका स्वीकार करते हुए मामले का निराकरण किया गया

Rajkumar