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तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों का पैरेलल सिस्टम? सामाजिक कार्यकर्ता अकील अहमद अंसारी ने उठाए व्यवस्था पर सवाल


IAS अधिकारी रिंकू सिंह राही के “समानांतर सिस्टम” वाले बयान का संदर्भ देते हुए सरगुजा की व्यवस्था पर अंसारी ने साधा निशाना

 

RK GLOBAL NEWS रायपुर / सरगुजा विशेष रिपोर्ट। “तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों का पैरेलल सिस्टम”—सामाजिक कार्यकर्ता एवं असिस्टेंट प्रोफेसर अकील अहमद अंसारी की फेसबुक वॉल पर प्रकाशित एक विस्तृत लेख इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। लेख में उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था, रसूखदार लोगों के प्रभाव, सोशल मीडिया की भूमिका और पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने आने वाली चुनौतियों को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं।

अंसारी ने अपने लेख में उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी रिंकू सिंह राही द्वारा मार्च 2026 में दिए गए त्यागपत्र और उनके द्वारा प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर कथित “समानांतर सिस्टम” को लेकर लगाए गए आरोपों को आधार बनाया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार राही ने लंबे समय तक सार्थक पोस्टिंग और काम नहीं मिलने की बात कहते हुए तकनीकी इस्तीफा दिया था तथा प्रशासनिक व्यवस्था के समानांतर एक अलग सिस्टम विकसित होने का आरोप लगाया था।

हालांकि, बाद की रिपोर्टों के अनुसार राही ने अप्रैल 2026 में अपना तकनीकी इस्तीफा वापस ले लिया था।

“लोकतंत्र के समानांतर दूसरी व्यवस्था” पर सवाल

अकील अहमद अंसारी अपने लेख में सवाल उठाते हैं कि देश में संवैधानिक लोकतंत्र और कानून का शासन होने के बावजूद क्या प्रभावशाली और धनाढ्य लोगों के लिए व्यवहार में कोई अलग व्यवस्था काम करती है?

उन्होंने लिखा है कि समाज में आर्थिक रूप से मजबूत और रसूखदार व्यक्तियों को कई बार “प्रतिष्ठित” व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनका आरोप है कि कुछ मामलों में धन, राजनीतिक पहुंच और सामाजिक प्रभाव के कारण ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया प्रभावित होने की धारणा बनती है।

अंसारी ने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होती है तो उसके समर्थकों द्वारा उसे सार्वजनिक रूप से किस तरह प्रस्तुत किया जाता है और दूसरी ओर पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR होने पर उन्हें तत्काल दोषी ठहराने जैसा माहौल क्यों बनाया जाता है।

FIR किसी को दोषी नहीं बनाती, तो यह सिद्धांत सबके लिए समान हो”

लेख में अंसारी ने कानून के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को सामने रखा है। उनका कहना है कि यदि किसी रसूखदार व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होने के बाद यह कहा जाता है कि “FIR होने से कोई दोषी नहीं हो जाता, न्यायालय का फैसला आने दीजिए”, तो यही सिद्धांत पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि कानून और न्याय की यह कसौटी प्रभावशाली लोगों और आम लोगों के लिए अलग-अलग क्यों दिखाई देनी चाहिए।

उनका जोर इस बात पर है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों को तथ्य और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर देखा जाना चाहिए, न कि उसकी सामाजिक हैसियत, राजनीतिक पहुंच या आर्थिक प्रभाव के आधार पर।

सोशल मीडिया को बताया बदलाव का बड़ा माध्यम

अंसारी के अनुसार सोशल मीडिया ने सूचना के प्रसार की पूरी तस्वीर बदल दी है। पहले किसी घटना या शिकायत को सीमित दायरे में दबा देना अपेक्षाकृत आसान हो सकता था, लेकिन आज दस्तावेज, तथ्य और घटनाक्रम कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं।

उनका कहना है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को बदनाम करने के लिए नहीं, बल्कि तथ्यों को सार्वजनिक विमर्श में लाने और जवाबदेही के सवाल पूछने के लिए किया जाना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि जब पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ सवाल उठाते हैं तो उनके विरुद्ध प्रोपेगेंडा, चरित्र हनन और बिना पर्याप्त प्रमाण के गंभीर आरोप लगाने जैसी कोशिशें भी सामने आती हैं।

हालांकि, अंसारी अपने लेख में यह भी स्पष्ट करते हैं कि सोशल मीडिया पर किसी भी आरोप को अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए। तथ्य, दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया ही किसी मामले की वास्तविकता तय करने का आधार होने चाहिए।

पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के समर्थन की अपील

लेख में अंसारी ने विशेष रूप से पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति समाज की भूमिका पर सवाल उठाया है।

उनका कहना है कि यदि किसी पत्रकार पर FIR दर्ज हो जाए या उसे किसी मामले में आरोपी बनाया जाए तो इससे उसके द्वारा उठाए गए प्रत्येक सवाल को स्वतः गलत नहीं मान लिया जाना चाहिए।

उन्होंने लिखा कि यदि किसी पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता पर मामला दर्ज होता है तो उसका निर्णय न्यायालय करेगा, लेकिन उस व्यक्ति द्वारा उठाए गए जनहित के सवालों का जवाब देना भी जरूरी है।

अंसारी ने लोगों से अपील की कि व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध के बजाय मुद्दे और तथ्यों पर चर्चा होनी चाहिए।

धर्म, जाति और राजनीति से ऊपर उठकर सड़क, बिजली, शिक्षा और न्याय के सवाल

अपने लेख में अकील अहमद अंसारी ने जनता से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर अधिक जागरूक होने का आह्वान किया है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई समाज को धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर बांटने का प्रयास करे तो जनता को अपने वास्तविक मुद्दों—सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय—पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए।

उनका कहना है कि किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लिए बिना उसके प्रचार का हिस्सा बनने के बजाय जनता को प्रत्येक राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय पर सवाल पूछने चाहिए।

“किसी को मसीहा मत बनाइए”

लेख का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि किसी एक व्यक्ति को व्यवस्था परिवर्तन का नायक या मसीहा बनाने के बजाय समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

अंसारी लिखते हैं कि कोई व्यक्ति सच लिखे, कोई सवाल पूछे, कोई दस्तावेज सामने लाए, कोई पीड़ित के साथ खड़ा हो और कोई गलत को गलत कहने का साहस करे—तो सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव संभव है।

उनके अनुसार व्यवस्था सुधार किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास का परिणाम होता है।

सरगुजा की जनता से किया जागरूक रहने का आह्वान

अकील अहमद अंसारी ने अपने लेख के अंत में सरगुजा संभाग के लोगों से तथ्यपरक, तार्किक और बेबाक बनने का आह्वान किया है।

उन्होंने कहा कि तथाकथित प्रतिष्ठा, राजनीतिक पहुंच, धन और रसूख के आधार पर किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं माना जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी संदेश दिया कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध केवल आरोप लगने के आधार पर उसे दोषी मान लेना भी उचित नहीं है।

उनके लेख का मूल संदेश यही है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार और न्याय की प्रक्रिया सभी के लिए समान होनी चाहिए।

अंसारी ने अंत में सवाल छोड़ा है—क्या तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों और उनके प्रभाव से संचालित कथित समानांतर व्यवस्था पर सवाल उठाना और उसे तथ्यों के आधार पर सार्वजनिक विमर्श में लाना जारी रहना चाहिए?

अब इस सवाल पर सरगुजा की जनता और सामाजिक संगठनों के बीच बहस शुरू होना स्वाभाविक है।

नोट: उपरोक्त समाचार सामाजिक कार्यकर्ता एवं असिस्टेंट प्रोफेसर अकील अहमद अंसारी की फेसबुक वॉल पर प्रकाशित लेख के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में व्यक्त आरोप एवं विचार लेखक के हैं; उन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा रहा है।

Rajkumar